तो क्या मान लिया जाए कि अमेरिका और चीन की व्यापारिक तनातनी ट्रेड वार का रूप ले चुकी है और अब इसके दूरगामी वैश्विक नतीजों की उल्टी गिनती का समय आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बीते कुछ समय से जैसी घुड़की दिखा रहे थे, उसे आगे बढ़ाते हुए उन्होंने चीन के आयात पर 60 अरब डॉलर का टैरिफ लगाने की घोषणा की, तो चीन ने भी अमेरिका के 128 उत्पादों से शुल्क रियायतें हटाने की प्रक्रिया शुरू कर खुले ट्रेड वार का एलान ही कर दिया। अमेरिकी टैरिफ का असर अगर स्टील और एल्युमिनियम पर पड़ेगा, जिसका चीन बहुत बड़ा निर्यातक है, तो अमेरिकी उत्पादों पर रियायत हटाना अमेरिकी बाजार के लिए बड़ा झटका साबित होगा।
अमेरिका-चीन के ताजा टकराव को वैश्विक व्यापार युद्ध की शुरुआत कहना मुफीद होगा। देखने में भले ही यह परस्पर हैसियत बताने की लड़ाई लगे, लेकिन इसके वैश्विक रूप लेने के नतीजे गंभीर होंगे। यह अंतत: बेरोजगारी बढ़ाने, आर्थिक रफ्तार में मंदी और व्यापारिक साझीदारों के रिश्ते बिगाड़ने वाला साबित होगा, क्योंकि भूलना नहीं चाहिए कि ट्रेड वार एक तरह से संबद्ध देशों द्वारा अपने उद्योग बचाने के प्रयास से उपजा संरक्षणवाद है, जिसका असर अंतत: दूसरे देशों या उत्पाद विशेष के निर्यातक देश पर सीधे पड़ता है। ट्रंप इसी संरक्षणवाद के पोषक बने दिखाई दिए हैं। वह अपने स्वदेशी के फॉर्मूले पर इतना मुग्ध हैं कि अक्सर दीर्घकालिक हित भी नहीं देख पाते। वीजा में कटौती से भारतीयों को रोजगार में झटका देने के नाम पर अपने ही आईटी उद्योग की जड़ में मट्ठा डालना भी ऐसा ही कदम था, जब वह असली हित भूल जाते हैं। ताजा कदम का असर चीन-अमेरिका से अलग तमाम देशों पर पड़ने जा रहा है, क्योंकि इनके द्विपक्षीय व्यापार निवेश संबंधों की बुनावट वैश्विक आपूर्ति चेन से जुड़ी है और ऐसी किसी तनातनी का अन्य देशों की कंपनियों और उपभोक्ताओं पर सीधा असर पड़ेगा।
स्वाभाविक है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच का यह युद्ध उन द्विपक्षीय ही नहीं, बहुपक्षीय बाजार व्यवस्थाओं को चुनौती दे रहा है, जो 1990 के बाद से वैश्विक बाजारों को नियंत्रित करती आई हैं। यही कारण है कि ट्रंप की सोच और काम को लेकर अब अमेरिका में ही खुलकर उंगलियां उठने लगी हैं। माना जाने लगा है कि वह अपनी जिद पर चलते हैं, जो अक्सर घातक साबित हो रही है। अमेरिका के भीतर-बाहर चल रही इन बहसों पर गौर करने की जरूरत है।ट्रंप ने अर्थव्यवस्था की मजबूती के नाम पर जैसा कदम उठाया है, सवाल उठने लगे हैं कि जिन भी देशों के साथ अमेरिका व्यापारिक घाटा झेल रहा है, उन पर उसकी इस नीति का सीधा असर पड़ेगा। यानी यदि यह निष्कर्ष निकाला जाए कि जिस तरह एशिया के लगभग सभी देश अमेरिका को अच्छा-खासा निर्यात करते हैं, तो मुनाफे के नाम पर उन्हें भी किसी भी वक्त, ऐसे ही नतीजों के लिए तैयार रहना चाहिए। शायद यह सवाल ऐसे तमाम देशों के लिए खतरे की घंटी भी हो। अच्छी बात यह है कि भारतीय स्टील कंपनियों पर फिलहाल अमेरिकी फैसले का कोई सीधा असर नहीं पड़ने जा रहा, क्योंकि उनके कुल निर्यात में अमेरिकी बाजार की हिस्सेदारी दो फीसदी से भी कम है। हां, इसके कुछ छिपे हुए खतरे भी होंगे, जो समय के साथ सामने आएंगे।
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